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गुरुवार, 2 नवंबर 2017

ग्लोबल वार्मिंग

                     आज विश्व समुदाय को ग्लोबल वार्मिंग जैसे ज्वलंत मुद्दे से परिचित होकर उसके निराकरण के लिए अपना-अपना योगदान तय करने की आवश्यकता है।  निरंतर सामने आ रहे वैज्ञानिक निष्कर्ष हमारी चिताओं को गहरा करते जा रहे हैं। सौरमंडल का एकलौता ग्रह पृथ्वी जिस पर जीवन है उसके अस्तित्व को  मनुष्य की आधुनिक जीवनशैली ने  ख़तरे में दाल दिया है। 

                     ग्लोबल वार्मिंग अर्थात पृथ्वी पर तापमान में वृद्धि। जिसकी मुख्य वजह ग्रीन हाउस गैसें ( कार्बन-डाई-ऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड , ओज़ोन और जलवाष्प आदि ) हैं। ये गैसें वातावरण में ऊर्जा प्रवाह ( गर्मी को अवशोषित करना और पुनः उस गर्मी को पृथ्वी पर लौटा देना जिससे धरती का तापमान बढ़ता है ) को प्रभावित करती हैं। 

                    ग्लोबल वार्मिंग के मुख्य कारणों में CO2 के स्तर में बढ़ोत्तरी, जीवाश्म ईंधन का अंधाधुंध प्रयोग, विभिन्न कारणों से धरती पर ताप उत्पन्न करना (कारख़ाने ,उद्योग आदि ), आधुनिक जीवन शैली , प्रदूषण और पेड़-पौधों की निर्मम कटाई आदि ।

वनस्पति और जीवों के बीच प्रकृति ने अनूठा सम्बन्ध स्थापित किया है जिसे मनुष्य ने अपने स्वार्थ में डूबकर धता बताई और आज पृथ्वी के लिए आसन्न ख़तरा विकराल रूप धारण कर चुका है। 

                वनस्पति हमारे द्वारा साँस में ऑक्सीजन ग्रहणकर वापस छोड़ी गयी ज़हरीली कार्बन-डाई-ऑक्साइड गैस को अपने लिए इस्तेमाल करती है और प्राणवायु  ऑक्सीजन हमारे लिए वातावरण में छोड़ती है इस तरह पर्यावरण में संतुलन रहता है।  पर्यावरण में असंतुलन को शहरीकरण , इमारती लकड़ी के शौक़िया प्रयोग , ईंधन में लकड़ी का प्रयोग , वृक्षारोपण के प्रति उदासीनता आदि बढ़ावा दे रहे हैं। 

  हाल ही में दिल्ली शहर में एक कार की बड़ी चर्चा है।  कार की छत पर गमलों में लगे पौधे रखकर चलना एक अनूठा प्रयोग है पर्यावरण के प्रति अपना योगदान देने का, दूसरों की परवाह के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करने का।  भले ही लोग इसे हास्यास्पद प्रयोग कहें लेकिन पीछे छिपी गंभीरता पर विचार करने की आवश्यकता है।     

सूर्य से आने वाले हानिकारक विकिरण को रोकने वाली पृथ्वी के ऊपर स्थित ओज़ोन छतरी में भी छेद होने की वजह क्लोरो फ्लोरो कार्बन को माना गया है। पृथ्वी से ऊपर उठने वाली हानिकारक गैसें और प्रदूषण पृथ्वी से कुछ ऊँचाई पर एक प्रकार की धुंध- छतरी का निर्माण कर देते हैं जिससे पृथ्वी की सतह से टकराकर लौटने वाली सूर्य की गर्मी, विकिरण और उत्पन्न हुई गर्मी को यह प्रदूषित छतरी आसमान में पुनः जस का तस लौट जाने से रोककर पृथ्वी के वातावरण में ही लौटा देती है जिससे धरती का तापमान बढ़ता है। 
पृथ्वी का तापमान बढ़ने से अनेक प्राकृतिक आपदाऐं आती हैं। पृथ्वी के ध्रुवों (ग्लेशियरों जहां दिन छह माह का और रात छह माह की , विशालतम बर्फ़ के भंडार ) पर जमी बर्फ़ पिघलकर समुद्र के जलस्तर को बढ़ायेगी और समुद्री किनारों पर बसे शहर तथा अनेक टापू डूबने से नहीं बचेंगे। पृथ्वी का तापमान निरंतर बढ़ते जाने से जीवन की संभावनाओं को भी ख़तरा उत्पन्न हो गया है। 
वैज्ञानिकों का निष्कर्ष ठोस तथ्यों पर आधारित है अतः इस मुद्दे को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है। 
आदरणीया श्वेता जी ने ठीक ही कहा है कि यह स्थिति एक व्यक्ति के सोच लेने या प्रयास करने से बदलने वाली नहीं है बल्कि सभी को अपनी-अपनी भूमिका तय करनी चाहिए। 

#रवीन्द्र सिंह यादव