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रविवार, 29 अक्तूबर 2017

देवठानी एकादशी : भारतीय संस्कृति का लोचदार पर्व


   देवशयनी एकादशी से देवठान एकादशी तक.... 

              कल कार्तिक मास की शुक्लपक्षीय देवठानी ग्यारस (एकादशी ) है अर्थात मांगलिक कार्यों  पर लगी वर्जना के समाप्त होने का दिन। शुभ कार्यों में देवों के आह्वान का पुनः आरम्भ। त्यौहारों ने हमारे जीवन को सात्विकता से बांधकर रखा है। जीवन मूल्यों को निखार देते हैं त्यौहार। सद्भाव और सौजन्य का निर्माण करते हैं त्यौहार। लोकदृष्टि और लोकहितकारी सोच का सृजन करते हैं त्यौहार।   

           भारतीय जीवन दर्शन में एक पद्धयति विकसित की गयी जो जीवन को सारगर्भित बनाते हुए सत्य की ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करे और समाज में सद्भावना का निरंतर विकास होता रहे। सामाजिक मूल्य सत्य ,प्रेम ,करुणा ,दया ,त्याग ,परमार्थ ,परहित ,अहिंसा ,भक्ति ,सत्कार ,सेवा ,सहनशीलता ,समर्पण ,सहायता ,सुकर्म आदि अनवरत विकसित होकर समाज का उत्थान करते रहें इसी मंतव्य से वैदिक साहित्य में सनातन धर्म से जुड़े आख्यानों की प्रचुरता है।प्राचीन धार्मिक ग्रंथ वेदों (ऋग्वेद ,यजुर्वेद ,सामवेद ,अथर्ववेद ) में वर्णित ज्ञान और गूढ़ रहस्य को सरलीकृत करने के उद्देश्य से पुराणों की रचना ब्राह्मण विद्वानों ने की जिनमें सृष्टि ,देवी-देवताओं से लेकर राजाओं तक के विवरण व वंशावलियाँ मिलती हैं। अर्थात पुराण एक तरह के विस्तार हैं जिनमें कई उल्लेख विवादस्पद भी हैं और अप्रामाणिक भी। 

             भारतीय सामाजिक जीवन में रची-बसी मान्यताओं ,परम्पराओं ने समय-समय पर सार्थक रुप बदले और समाज को उत्कृष्ट आयाम प्रदान किये हैं तथा अपने विराट लचीलेपन ( कर्मकांड, निर्गुण और नास्तिक / साकार-निराकार ) से विश्वभर को प्रभावित किया है इसीलिए भारतीय संस्कृति और सभ्यता की अंतः सलिला सतत बहती आ रही है, दूसरों को अपनी ओर आकर्षित करती आ रही है जिस पर हमें गर्व है। 

             चौमासा (चातुर्मास) भारतीय सामाजिक परिवेश में स्थापित शब्द है जिससे जुड़ी मान्यता मूल्यवान है तभी तो जनमानस ने उसे सहर्ष स्वीकार किया है। भारतीय कैलेंडर चैत मास से आरम्भ होता है जिसका चौथा महीना आषाढ़ है। आषाढ़ अर्थात वर्षा ऋतु का आरम्भ। खरीफ फ़सल की जुताई-बुवाई का समय। वर्षाकाल में नदी-नालों में बाढ़ का समय। फ़सल की देखभाल का समय , भोजन के रखरखाव में विशेष सावधानी बरतने का समय , मनुष्य और पशुओं को प्रभावित करने वाली मौसमी बीमारियों का समय ,शरीर की इम्मूनिटी पावर घट जाने का समय, कीड़े-मकोड़ों , सांप-बिच्छू आदि के बढ़ने और बिलों से बाहर आकर विचरण का समय,प्रकृति के पुनः सजने-संवरने का समय, पेड़-पौधों के बढ़ने और पल्लवित होने का समय, जलाऊ ईंधन के गीले-सीले होने का समय ,घातक बैक्टीरिया ,वायरस और फंगस के अत्यधिक बढ़ने का समय, जड़ी-बूटियां आदि एकत्र करने में कठिनाई का समय , सुहानी ऋतु में प्रकृति की सुकुमारता के अवलोकन और आनंद लेने का समय। साफ़-सफ़ाई बरक़रार रखने में दुश्वारियों का समय, सूर्य के अक्सर बादलों में छुपकर धूप धरती तक न पहुँचा पाने का समय,प्रकृति के प्रकोप का समय ,घर-द्वार-परिवार बचाने का समय, आवागमन के लिए दुर्गमता का समय ......... आदि-आदि। 

                  इसलिए यदि पौराणिक कथाओं में ऐसा कहा गया कि आषाढ़ मास की शुक्लपक्ष एकादशी ( देवशयनी या हरिशयनी एकादशी ) से अगले चार माह अर्थात कार्तिक मास की शुक्लपक्ष एकादशी (देवठान ग्यारस / देवठान एकादशी / प्रबोधिनी एकादशी ) तक देवताओं के अधिपति भगवान विष्णु देवताओं सहित (अग्नि देवता का विशेष महत्त्व ) शयन को चले जाते हैं तो कल्पना कीजिये उन तात्कालिक परिस्थियों में ऐसा कहना ही उपयुक्त रहा होगा क्योंकि इसमें स्वहित न होकर व्यापक सामाजिक हित समाया हुआ है। अपवादों का तो हर जगह बोलबाला रहा है। ईष्ट कभी सोता नहीं है लेकिन सामूहिक रूप से समाज को समझाने का यही तरीका उस वक़्त उपयुक्त रहा होगा। और यदि हम सकारात्मक दृष्टिकोण से सोचें तो आज भी यह विचार बेदम और बेकार नहीं है बस हमें उसके भाव की व्यापकता को आत्मसात करना चाहिए। इन चार महीनों में साधु-संत अक्सर एक ही स्थान पर रूककर धर्म और ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया करते थे। 


                   चौमासा में मांगलिक कार्यों ( विवाह, कारोबार आरम्भ करने ,नया निर्माण करने , भोजन सम्बंधी वर्जनाएं आदि ) को वर्जित किये जाने का विचार सनातनी परंपरा में गहराई तक व्याप्त हो गया। पौराणिक कथाओं में एक कथा सतयुगीन राजा मांधाता , ब्रह्मा जी के पुत्र अंगिरा ऋषि और शूद्र की तपस्या से भी जुड़ी हुई मिलती है जोकि तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में वर्ण-व्यवस्था के प्रभाव को रेखांकित करती है। ईश्वर ने हमें बंधनों और भेदभाव के साथ जन्म नहीं दिया बल्कि कालांतर में स्वर्ग-नरक ,पाप-पुण्य के फेर में जीवन को अनेक वर्जनाओं में बांध दिया गया जोकि ज्ञानी जनों का कार्य है कि वे सामाजिक विकृतियों पर गहन चिंतन - मनन करें और धर्म को मानवीयता के पथ पर अनवरत चलते रहने से भटकने न दें।

                "उठो देव", "बैठो देव" का पवित्र उच्चारण और गन्ना पूजन, घंटा-ध्वनि  का सुखमय दृश्य कभी नहीं भूलता ..... सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है कल आने वाली तिथि "देवठानी एकादशी"....... सभी को अग्रिम हार्दिक मगंलकामनायें ! 


#रवीन्द्र सिंह यादव