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बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

पटाखों से हुई ज़हरीली हवा फेफड़ों में धर्म पूछकर नहीं घुसती

       समाचारों के अनुसार दिल्ली में पिछली साल की तरह स्मोग का सितम  इस बार भी छाने वाला है। विगत  9 अक्टूबर को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए 31 अक्टूबर  2017 तक दिल्ली-एनसीआर (N C R=NATIONAL CAPITAL REGION)  में पटाखों की बिक्री पर रोक लगाने  का आदेश दिया है। उल्लेखनीय है कि अदालत ने बिक्री पर रोक लगायी है कि पटाखे चलाने पर।  एनसीआर में दिल्ली से सटे प्रदेशों हरियाणा,उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ शहर और  क़स्बे (हरियाणा से  गुरुग्राम ,फ़रीदाबाद ,रोहतक,करनाल, झज्जर ,रेवाड़ी ,पलवल ,सोनीपत ,जींद ,दादरी,मानेसर ; उत्तर प्रदेश से नोइडा (NOIDA = NEW OKHLA INDUSTRIAL DEVELOPMENT AUTHORITY ), ग़ाज़ियाबाद,मेरठ,बाग़पत,हापुड़ ,मुज़फ़्फ़रनगर ,बुलंदशहर और राजस्थान से अलवरआते हैं। 

        पीएम 2.5 हवा की तंदुरस्ती का मापक बन गया है। ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ पीएम 2.5 (PM= Particulate Matter) हवा में मौजूद अत्यंत हानिकारक महीन कण जोकि सांस  द्वारा सीधे फेंफड़ों तक पहुँच सकते हैं इनकी मात्रा  हाल ही में 5 गुना बढ़ गयी है। पिछली दिवाली पर पटाखों ने इतना प्रदूषण फैलाया था कि उस दिन विश्व में सर्वाधिक प्रदूषित शहरों की सूची में दिल्ली ने अपना नाम अव्वल स्थान पर दर्ज़ करा लिया था और अगले 10 दिन तक प्रदूषण ने लोगों का जीना दुश्वार कर दिया था। 

         आजकल बड़े शहरों में प्रदूषण को मापने के लिए ऑनलाइन इंडिकेटर्स सक्रिय हैं। इनके द्वारा उपलब्ध आंकड़ों से हमें हवा की सेहत का पता चलता है। AQI (AIR QUALITY INDEX )  0-50 सर्वोत्तम है।  51-100 को संतोषजनक माना जाता है।  101 होते ही स्वास्थ्य के लिए हानिकारक स्थिति बन जाती है। सांस के मरीज़ों से लेकर सामान्य व्यक्ति भी इस स्थिति में परेशानी अनुभव करने लगता है।  यह आंकड़ा 300 पार करते ही आपातकाल की स्थिति आ जाती है। ज़रा सोचिये पिछली दिवाली पर पटाखों के कारण हुए प्रदूषण ने इस इंडेक्स को 431 पर पहुँचा दिया था। अतः पटाखों से जुड़ी इस भयावह स्थिति से देश के हरेक नागरिक को अवगत होने की सख़्त ज़रूरत है भले ही अज्ञानतावश लोग इसे नकारते रहें और अपनी ख़ुशी को धार्मिक एंगिल से जोड़कर दूभर होती सांस लेने की कठिनाई को नज़रअंदाज़ करते रहें। 


            हमारी नाक में प्राकृतिक फ़िल्टर होता है जोकि सांस में खींची गयी  हवा  में मिले हुए तमाम  नुकसानदेह कणों को फेंफड़ों तक जाने से रोकता है। लेकिन जब 2.5 माइक्रोन के कण हवा में तय मात्रा से अधिक होंगे तो श्वांस के ज़रिये शरीर में जाकर वे अनेक प्रकार के श्वांस सम्बन्धी रोग उत्पन्न करते हैं। सडकों,वाहनों के परिचालन ,पुरानी गिराई जा रही इमारतों (शहरों में आजकल अल्ट्रा मॉडर्न डिज़ाइन और सुबिधाओं के फ़ेर में मज़बूत इमारतों को भी तोड़कर नया बनाया जा रहा है ), खुदाई,औद्योगिक गतिविधियों (पत्थर खदान,पत्थरों की कटाई-घिसाई,सीमेंट उद्योगआदि से उत्पन्न धूल ,पेट्रोल-डीज़ल,लकड़ी,कोयले,कचरे आदि का धुआँ इत्यादि मिलकर हवा को लगातार अस्वास्थ्यकर बना रहे हैं। 

            इस बार दिल्ली-एनसीआर में दिवाली की रौनक लोगों को  फीकी लग सकती है लेकिन माननीय सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला  सराहनीय है। मुमकिन है लोगों को पटाखों की कर्कश ध्वनि से आंशिक राहत मिले  और सांस लेने में ज़्यादा तकलीफ़ हो।ज़रा सोचिये  पटाखों की तेज़ कर्कश धमक प्रदूषण तो बढ़ाती ही है साथ में दिल के मरीज़ों,धमाकों से डरने वालों (मानसिक रोग की अवस्था, फोबिया), नौनिहालों और पशु-पक्षियों आदि को तो प्रभावित करती ही है साथ में आर्थिक,सामाजिक प्रभाव भी छोड़ती है। 

                 ख़ुशी का मनोविज्ञान भी अजीब है।  हम ख़ुशियाँ बांटकर ज़्यादा प्रसन्न होते हैं। भावातिरेक में ख़ुशी को दूर-दूर तक फैलाने के लिए दूसरों को होने वाली असुबिधा की परवाह को रौंदते हुए अपनी सामाजिक  जवाबदेही  को परे रख चीख़-चिल्लाहट के साथ अनेक आधुनिक यत्न करते हैं जिसके कि अब पार्श्व प्रभाव (SIDE EFFECTS) उभरकर सामने चुके हैं। कुछ लोगों को ख़ुशी हज़म नहीं हो पाती अचानक ब्लड प्रेसर ( रक्त दबाव) बढ़ने से वे दूसरी दुनिया की सैर पर निकल जाते हैं। उद्घोष,शंखनाद ,ढोल-नगाड़ों ,घंटा-ध्वनि ,बैंड-बाजों,संगीत,गायन,प्रसाद वितरण आदि के द्वारा सामान्यतः खुशियाँ बिखेरी जाती थीं लेकिन कालांतर में बारूद के आविष्कार ने ख़ुशी को विस्फोटक आवाज़ से मिलने वाले फ़रेबी सुकून और रोमांच  में उलझा दिया। पटाखे दिवाली उत्सव से कालांतर में जुड़ गये। मुग़लकाल से बारूद हमारी ख़ुशियों के प्रसारण से जुड़ गयी और आज की पीढ़ी बारूदी पटाखों से ख़ुशियाँ मनाते हुए बड़ी हुई है अतः उसे माननीय सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला नागवार गुज़रने वाला है।  हो सकता है कि लोग इस फ़ैसले को नकारात्मक रूप में लें और प्रतिक्रिया स्वरुप ज़्यादा पटाखे चलाने के उपक्रम करें। चंद स्वार्थी लोगों की लाभार्जन की नियत लोगों को मुद्दे से जुड़ी अहमियत से दूर ले जाती है और ऐसे लोग भावनात्मक पहलू उजागर करते हुए अंधश्रद्धा को बढ़ावा देते हैं ताकि उनका अपरोक्ष लक्ष्य पूरा हो सके। 
                
          पटाखों को लेकर हमारा जूनून इस हद तक बढ़ गया है कि सोशल-मीडिया में लोग खुलेआम सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना कर रहे हैं और मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने की ग़लत कोशिश में सीधा धर्म से जोड़ रहे हैं। इन महानुभावों को ज्ञात नहीं कि पटाखों से हुई ज़हरीली हवा फेफड़ों में धर्म पूछकर नहीं घुसती बस अपनी इक-तरफ़ा सोच को जायज़ ठहराने में कुतर्क लेकर समाज को भ्रमित करने के व्यापार में जुट गए हैं अपना स्वार्थ छुपाकर। 

                   आतिशबाज़ी के भव्य आयोजन , धार्मिक ,राजनैतिक जुलूस , चुनावों में जीत ,शादी-समारोह,नव वर्ष से जुड़े आयोजन और कभी-कभी क्रिकेट मैच में देश की टीम की जीत आदि ने पटाखा व्यापार को आधार प्रदान किया है।  कुछ लोगों को रोज़गार भी मिला है लेकिन इस व्यापार ने अनेक ज़िंदगियां तबाह भी कर डाली हैं और कुछ लोगों ने पैसा भी ख़ूब बनाया है।

पटाखों से बम तक के सफ़र में समाज गूंगा-बहरा हो चुका है।  आधुनिकता की आंधी पर्यावरण से जुड़ी समझ को भी उड़ा ले गयी। लोग अपने पड़ोसी  से प्रतिस्पर्धा करते हुए बच्चों के लिए पटाखों का बज़ट लगातार बढ़ाते चले गए।  अब दो बिल्डिंगों ( ऐसी इमारतें जहाँ कई परिवार बसते हैं ) के बीच पटाखे चलाने को लेकर बे-लिहाज़ प्रतियोगिता देखी जा रही है।  वे नहीं जानते कि उनके कृत्य  द्वारा हवा में मिलाया गया ज़हरीला धुआँ कितनी ज़िन्दगियों को तकलीफ़ में डालता है। 

बहरहाल एक आंकड़े पर विचार करते हैं
          लाइव इण्डिया पॉपुलेशन डॉट कॉम के अनुसार आज (11-10 -2017  समय दोपहर 12:32 ) भारत की जनसंख्या का अनुमानित आंकड़ा 1,28,63,46,956 ( एक अरब अट्ठाईस करोड़ त्रेसढ़ लाख छियालीस हज़ार नौ सौ छप्पन है। अब आधी जनसंख्या कम  कर दीजिये ( क्योंकि दक्षिण भारत और उत्तर-पूर्वी राज्यों में दिवाली और पटाखों को लेकर उत्तर भारत जैसा बेतुका  जूनून नहीं देखने को मिलता तथा कुछ धार्मिक कारणों से भी, दिवाली पर पूरे घर को जलते दियों से सजाया जाता है वहां   अब पटाखों का प्रभाव आंशिक तौर पर वहां भी पहुँच गया है ) तो आंकड़ा होगा 64,31,73,478 ( चौसढ़ करोड़ इक्कतीस लाख तेहत्तर हज़ार चार सौ अठहत्तर ) एक परिवार में अमूमन 5 सदस्य होते हैं अर्थात 12,86,34,695 ( बारह करोड़ छियासी लाख चौंतीस हज़ार छह सौ पंचानवेपरिवार दिवाली पटाखों के साथ मनाते होंगे या मनाते हैं जोकि एक अनुमान है।  अब मान लीजिये कि औसतन एक परिवार पटाखों पर 100 रुपये ख़र्च करता है ( कुछ परिवारों का पटाखों का बज़ट 10,000 रुपये से भी ऊपर होता हैतो कुल पटाखों पर बर्बाद हुई रकम होगी लगभग 1300 करोड़ रुपये .......!

       एक तरफ़ हम लगभग 1300 करोड़ रुपये आग के हवाले कर देते हैं सिर्फ़ रोमांचकारी ख़ुशी की ख़ातिर और दूसरी ओर अनेक लोगों का इलाज का बज़ट भी बढ़वा दिया साथ में प्रदूषण को बढ़ाने में अपना योगदान भी झौंक दिया नासमझी में। 
       दिवाली पाँच दिन का त्यौहार है अतः लोग सिर्फ़ एक दिन ही पटाखे नहीं चलाते। पटाखों का दमघोंटू ज़हरीला धुंआ ,कानफोड़ू कर्कश आवाज़ और पटाखों के परख़च्चे उड़ने से पैदा हुआ कचरा सभी पर्यावरण को भारी नुकसान  पहुँचा रहे हैं। आर्थिक बर्बादी के अलावा यह सनक अब ख़ुशी की सीमाएं लांघकर आफ़त बन चुकी है। 
        दीपावली पर पटाखों का शोर शुरू होते ही अस्पतालों में पटाखों से घायल और सांस की तकलीफ़ के साथ लोगों का आना आरम्भ हो जाता है जिनमें अधिकांश अबोध बच्चे और वृद्धजन होते हैं। बिना पटाखों के हमें दिवाली मनाने में थोड़ा असहज लग सकता है लेकिन दूसरों की परवाह करते हुए ,पर्यावरण प्रेमी बनते हुए यदि आप ज़हरीली होती हवा को सांस लेने के लिए और अधिक ज़हरीला बनने में अपना योगदान हटा लेंगे तो आपको जवाबदेह नागरिक होने का एहसास पुरसुकून से भर देगा। 
पटखारहित दिवाली की पेशगी हार्दिक शुभकामनाऐं। 

प्रस्तुत लेख देश के विभिन्न भागों में रहने वाले लोगों से चर्चा के बाद मैंने लिखा है जिसमें शामिल हैं

 1. कुमारी रवनीत कौर  
 2. श्रीमती राखी के.आर
 3. श्रीमती शैली घिल्डियाल   
 4. श्रीमती तरु मारवाह  
 5. श्री प्रवीण कुमार 
 6. श्री क्षितिज कुमार 
 7. श्री विरेश कुमार   
 8. श्री तुषार रोहिल्ला 
 9. कुमारी जोहिता महापात्रा 
10. कुमारी रानी वांगशोल 
11. कुमारी काजल चौधरी 
12. कुमारी सरिता          
13. श्रीमती सूजा       
14. कुमारी प्रीति           
15. श्री मुकुंद राजपूत   
16. श्री राजकुमार प्रसाद 
17.श्री विनोद कुमार शर्मा  
18. मियां मोहम्मद शाहनवाज़ सिद्दीकी 
19. श्री गौरव मिश्रा 
20 . कुमारी हन्नू श्री  

# रवीन्द्र सिंह यादव