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सोमवार, 25 सितंबर 2017

राष्ट्रवाद की चालाक व्याख्या में पिसती छात्राओं की आज़ादी

             वाराणसी के डिग्री कॉलेज़ बंद कर दिए गए हैं। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में आगामी  2 अक्टूबर  तक छुट्टी घोषित कर दी गई है। ख़बर है कि हॉस्टल जबरन ख़ाली कराये जा रहे हैं। अब ख़बर आ रही है कि प्रशासन ने ऐसा कोई आदेश ज़ारी नहीं किया है।   21 सितम्बर 2017 को शाम 6 से 7 बजे के बीच एक छात्रा के साथ हुई छेड़छाड़ की घटना के बाद बनारस उबाल ले रहा है। अब प्रशासन की ओर से बलपूर्वक धरना समाप्त करा दिया गया है। कल  एक राजनैतिक दल के नेता भी अपनी सियासी रोटियाँ सेंकने  पहुँचे लेकिन पुलिस ने उन्हें छात्राओं से मिलने नहीं दिया। ताज़ा ख़बर है कि हज़ार अज्ञात छात्र-छात्राओं पर केस दर्ज़ कर लिया गया है और  लाठीचार्ज़ के लिए जवाबदेह अधिकारियों को पद से हटाया जा रहा है।  माहौल अब भी तनावपूर्ण बताया जा रहा है।
           
              छात्राओं की मांग थी कि कुलपति उन्हें विश्वविद्यालय परिसर में पुख़्ता सुरक्षा का आश्वासन दें मीडिया के सामने लेकिन ज़िद के चलते  ऐसा हो न सका और आंदोलन लम्बा खिंचकर हिंसक हो गया। छात्राओं ने पहली रात सड़क पर ही गुज़ारी दूसरी रात पुलिस की ओर से आँसू गैस के गोले छोड़े गए और बर्बर लाठीचार्ज़ किया गया (छात्राओं के  हॉस्टल में भी हुआ लाठीचार्ज़ ) तब तक छात्र भी इस आंदोलन में कूद पड़े थे। कई छात्राएं बुरी तरह घायल हुई हैं।  सर्वाधिक चिंता का बिषय है छात्राओं के सर पर पुलिस द्वारा लाठी का प्रहार करना।  पिछले तीन वर्षों में यह दूसरा मौका है यहां छात्राओं के आंदोलन का।  इससे पूर्व  बीएचयू में छात्राओं पर  शाम के बाद हॉस्टल से बाहर जाने पर अनेक प्रकार के प्रतिबन्ध थोपे जाने पर आंदोलन हुआ जिसकी चर्चा संसद में भी हुई।आवासीय परिसर में छात्राओं पर लगी पावंदियों को लेकर मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक भी पहुँचा है।

              सांस्कृतिक परंपराओं के नाम पर सारी ज़ोर आज़माइश महिलाओं पर ही क्यों ? क्या पुरुषों को महिलाओं की गरिमा और स्वतंत्रता के प्रति संवेदनशील होने की ज़रूरत नहीं है ? घरों से ही महिलाओं के प्रति भेदभाव के बीज डाले जाते हैं जिसकी धमक समाज में सुनाई देती है।  महिलाओं पर अत्याचार का यह कोई पहला मामला नहीं है।  भारतीय नारी के जीवन में सामाजिक वर्जनाओं की मजबूत बेड़ियाँ  उसे आज़ाद-ख़्याल  होने से रोकती रही हैं। छात्राओं का इस प्रकार अपनी सुरक्षा और यौन उत्पीड़न के विरुद्ध सड़क पर उतरना समाज की खोखली सोच को खुली चुनौती है।
 
             पीड़ित छात्रा ने सर्वप्रथम प्रोटोरियल बोर्ड के सदस्य से शिकायत की थी और अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने को कहा था लेकिन उल्टा छात्रा को ही ज़लील किया गया। जब छात्रा के साथ कुछ और छात्राएं अगले दिन (22 सितम्बर ) को प्रॉक्टोरियल बोर्ड के शीर्ष अधिकारी से शिकायत करने पहुँची तो बदमाशों पर कार्यवाई की बात को दरकिनार करते हुए छात्रा को और अधिक अपमानित होना पड़ा जिससे सभी छात्राऐं विचलित होकर विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ़  सिंहद्वार ( प्रवेशद्वार ) पर  धरने पर बैठ गयीं। इस बीच 22 और 23 सितम्बर 2017  को प्रधानमंत्री  का बनारस  दौरा भी संपन्न हो गया। इसमें  प्रदेश का पूरा आला दर्ज़े का प्रशासनिक अमला महामहिम राज्यपाल महोदय   समेत  मुख्यमंत्री तक मौजूद रहे लेकिन आंदोलनरत छात्राओं की मांग पर इनके कान पर जूं तक नहीं रेंगी।  सोने पे सुहागा कहें या करेला और नीम चढ़ा ....  इस  अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त  विश्वविद्यालय के कुलपति का बयान  कि "बीएचयू कैंपस से राष्ट्रवाद ख़त्म नहीं होने देंगे। "

           अपनी असफलताओं, लापरवाही ,संवेदनहीनता ,छात्राओं की वास्तविक समस्या से आँख मूंदना  और बहानेबाज़ी को राष्ट्रवाद से जोड़ना उतनी ही बड़ी बेशर्मी है जो आजकल पुलिस के चरित्र में उभर रही है।  बुद्धिजीवियों का वैचारिक खाँचों को सजाना ,संवारना,राजनैतिक चाटुकारता से भरे बयान देना आत्मघाती है। राष्ट्रवाद क्या यह कहता है कि आप पीड़ित की बात पूरी गरिमा के साथ न सुनकर अनदेखा करेंगे ( विशेषकर जब पीड़ित महिला हो ) और नारेबाजी करती निहत्थी छात्राओं के सर फोड़ने का आदेश पुलिस को देंगे ( सर की चोट अत्यंत घातक और जानलेवा हो सकती अथवा जीवनभर के लिए व्यक्ति को अपंग बना सकती है ) . एक ओर पुलिस दोपहिया वाहन सवार का  सर पर हेलमेट न होने पर चालान करती है वहीँ अपने शीर्ष अधिकारियों( संवेदनहीन ) के आदेश पर सर पर प्रहार करती है। सवा अरब से अधिक जनसंख्या के देश की जनता को अराजक होने से बचाने के हिंसक सरकारी उपाय अमानवीय हैं। स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार की बात यहां बेमानी हो जाती है जब डरपोक लोगों के हाथों में सत्ता की चाभी आ जाती है।  वे निर्ममतापूर्वक आम जनता का सरकारी मशीनरी के इस्तेमाल से दमन करते हैं।

             सबसे बड़ा सवाल है महिलाओं के प्रति हक़ारत-भाव।  देश की सर्वोच्च ख़ुफ़िया व्यवस्था जब उस वक़्त वाराणसी में मौजूद थी ( हफ़्तों पहले से प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों की तैयारियाँ  चलती हैं  ) तब असामाजिक तत्वों की इस हरक़त पर अमल करने के बजाय विश्वविद्यालय प्रशासन का घटना को राष्ट्रद्रोही क़रार देना अपनी असफलता और कुंठित मानसिकता को निर्लज्जता से  छुपाना है। हो सकता है विरोधी तत्वों ने इस समय का चुनाव किया हो सरकार की बदनामी करने का और मौक़े का फ़ायदा उठाने का। जब सारी  व्यवस्था का संचालन आपके हाथ में है फिर आप इतनी धृष्टता से लोगों की आँख में धूल नहीं झौंक सकते। उल्लेखनीय है कि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय केंद्र सरकार के अधीन है। केंद्र सरकार के अधीन अधिकतर विश्वविद्यालय केंद्र सरकार की नीतियों के चलते विवादों में हैं।
 
               विश्वविद्यालयों में राजनीति पूरी तरह व्याप्त हो गयी है। जहाँ अध्ययन के बजाय जातिवाद ,साम्प्रदायिकता ,धार्मिक आडम्बर ,राष्ट्रवाद ,उदारवाद की बहस स्वस्थ न होकर केवल राजनैतिक निष्ठा और जातीय व  वर्गीय वैमनस्य से प्रेरित है। राष्ट्रवाद आम जनता का विचार नहीं होता है बल्कि यह एक संगठित  समूह का चालाक एजेंडा होता  है जोकि नफ़रत और बंटबारे की नींव रखता है जिसके मार्फ़त आम जनता को भावनात्मक मुद्दों पर बरगलाया जा सके ,उसे उग्र और हिंसक प्रवृत्तियों की ओर झौंका जा सके ताकि अघोषित मक़सद हासिल करने में आसानी हो।  बस एक शर्त होती है कि इस आग में केवल मासूम लोग ही झुलसते हैं। आज का राष्ट्रवाद ( अंध-राष्ट्रवाद / अति-राष्ट्रवाद ) खाये-पिए चंगे वर्ग का फैशनेबल जुमला है। क्यों न लोगों को लोगों से जोड़ने वाला ,असहमति का आदर करने वाला , सामंती सोच से मुक्त ,समतामूलक समाज के निर्माण की आधारशिला रखने वाला, इंसाफ़ के उत्कृष्ट मानदंडों वाला ,भेदभावरहित सभी को समाहित करने वाला  राष्ट्रवाद अपनाया जाय जहां वैचारिक स्वच्छंदता  के लिए पर्याप्त स्थान और अनुकूलन हो  और सर्वोदय जिसका केंद्रीय भाव हो जिसकी परिभाषा हमें पुनः शोधित करनी चाहिए।
इस वक़्त देश के समक्ष सबसे बड़ा सवाल -
मानवाधिकार आयोग और महिला आयोग भी क्या अब राजनैतिक निष्ठा की चाशनी में डूब चुके हैं ?

#रवीन्द्र सिंह यादव