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गुरुवार, 3 अगस्त 2017

चोटी बचा के रखना ...... अक़्ल खोल के रखना

       चोटी शब्द से हम सभी परिचित हैं। चुटिया ,चुटैया ,शिखा ,शिख  आदि इसके समानार्थक शब्द हैं।  साहित्य में नायक-नायिका के नख-शिख (पाँव के नाख़ून से लेकर मस्तक के शिखर पर बालों का भाग अर्थात शिख तक का अलंकृत करने वाला रसमय वर्णन मिलता है। महिलाओं की चोटी पर कई फ़िल्मी गीत और लोकगीत प्रचलन में हैं। आपने अब तक वोट कटवा ,मुँह नुचवा शब्द सुने और पढ़े होंगे अब एक नया शब्द ख़ौफ़ लेकर आया है "चोटी कटवा " .

        आजकल उत्तर भारत में "महिलाओं की चोटी-चर्चा " प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया / सोशल मीडिया / अफ़वाहों के बाज़ारों और शरारती तत्वों की मेहरबानी से उत्पन्न दिलचस्पी से गुलज़ार भी  है, ख़तरे में भी है। दुनिया अपनी सोच को तराशती हुई तर्कसंगत ज्ञान में अपना विश्वास बढ़ा रही है तब भारत में अंधविश्वासों के नए-नए प्रयोग सामने आते रहते हैं।  चोटी कटने से बचाने के लिए धार्मिक उपाय भी सामने आ रहे हैं।  तमाम टोने -टोटके ,तांत्रिक उपाय आदि  सामाजिक ढकोसले अचानक चर्चा में आ गए हैं।  इस अवसर को चालाक लोग भुनाने में जुट गए हैं और कमाई कर रहे हैं जबकि यह मात्र  एक  अफ़वाह है। लोगों को कही -सुनी व्यर्थ की बातों पर यकीन नहीं करना चाहिए।  सरकार द्वारा दी जा रही प्रामाणिक जानकारी और सलाह पर भरोसा करना चाहिए। 

       जुलाई 2017 में राजस्थान के ग्रामीण इलाक़े से  चली महिलाओं की चोटी  काटे जाने की  अफ़वाह अपनी  यात्रा में विस्तार करते हुए उत्तर प्रदेश ,हरियाणा, म. प्र. होते हुए दिल्ली तक पहुँच गयी है।  पुलिस और फोरेंसिक विशेषज्ञ  वास्तविकता का पता लगाने में जुटे हुए हैं इस अंतर्राज्यीय अवांछित समस्या की। लोग दहशत से भरे हुए हैं।
       सूचनायें एकत्र करने वालों को कोई ठोस कारण अभी तक हाथ नहीं लगा है।  लोग अलग-अलग कारण बता रहे हैं।  चोटी काटने वाला कभी पुरुष है ,कभी स्त्री है ,कभी बिल्ली है ,कभी अदृश्य शक्ति /अलौकिक शक्ति या चुड़ैल  (काल्पनिक डरावना पात्र ) है। कुछ लोगों के अनुसार यह शरारती तत्वों का कोई गैंग है। 

         जिस देश में शिक्षा का  स्तर गिराने के सरकारी प्रयास किये जा रहे हों। विश्वविद्यालयों में शिक्षार्थियों के प्रवेश पर अनेकानेक प्रकार के प्रतिबन्ध लगाए जा रहे हों , सीटों की संख्या घटाई जा रही हो ,शिक्षा का बज़ट घटाया जा रहा हो , विद्वानों का मज़ाक़  उड़ाया जाता हो वहाँ संगठित चालाक समूह अपनी कलाबाज़ी दिखाने में कहाँ चूकते हैं।

          मई 2017 में  झारखण्ड राज्य में सोशल मीडिया के ज़रिये  बच्चा चोर गैंग के सक्रिय होने की अफ़वाह फैलाई गयी परिणामस्वरूप  18  लोगों को भीड़ ने पीट -पीटकर मार डाला।
चोटी काटने की अफ़वाहों के चलते आगरा के ग्रामीण इलाक़े में एक बुज़ुर्ग  महिला को  चोटी काटने वाली चुड़ैल समझकर पीट -पीटकर अधमरा कर दिया जिसकी बाद में मौत हो गयी। 

            दरअसल जनता की बौद्धिक गहराई और मानसिक स्वास्थ्य को मापा जा रहा है ऐसे प्रयोगों से।  किसी चुनाव से पहले इन प्रयोगों की मंशा पर विचार अवश्य किया जाना चाहिए। 
पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश और दिल्ली में शिल-बट्टा और चाकी को रात में चुपचाप चुड़ैल द्वारा टाँकने की अफ़वाहें  मीडिया में सुर्खियाँ बटोर रहीं थीं। जबकि यह पत्थर कुतरने / काटने वाले एक कीड़े की करतूत थी।  ऐसे भ्रामक समाचार मीडिया की टीआरपी बढ़ा देते हैं। हर किसी की दिलचस्पी बढ़ जाती है यह जानने के लिए कि आगे और क्या-क्या  हुआ तो वह टीवी पर समाचार देखता -सुनता है या अख़बारों में पढ़ता है। 

         भारत में अफ़वाहों अर्थात भ्रमित समाचार फैलाकर अपने निहित स्वार्थ साधना कुछ लोगों का मक़सद रहा है। मुझे बचपन की दो अफ़वाहें याद हैं। एक (जोकि 70 के दशक की है )- जिसमें विवाहित बहन /बहनें अपने  भाई / भाइयों  को उनकी सलामती के लिए मायके में जाकर खीर खिलायें। मैंने देखा था बहनें आयीं -गयीं थीं भाइयों को खीर खिलाने अपने-अपने  मायके में।  अनावश्यक रूप से करोड़ों बहनों की मेहनत की कमाई किराये -भाड़े ,चावल ,चीनी ,दूध ,मेवे आदि में ख़र्च हुई और बेचने वालों ने नफ़ा कमाया।  फिर भी भाइयों की मौतें होती रहीं जैसे पहले होती थीं।  
दूसरी (जोकि 80 के दशक की है ) - माँ अपने हर बेटे के नाम से 10 गुलगुले (आटा ,चीनी या गुड़ से बने मीठे पुए / पकोड़े ) खाये ताकि बेटों  पर से  मौत का ख़तरा टल जाय। यहाँ भी तेल,गुड़ और चीनी को संगठित धूर्तता ने महंगा बिकवा दिया था लेकिन लोग अपनी  मौत मरते रहे। 

       90 के दशक के आरम्भ में तोरई के पत्ते पर नाग-नागिन की आकृति का जन-भ्रम  इतनी प्रचण्डता पा गया कि इसकी चर्चा संसद तक में हुई।  कृषि -वैज्ञानिकों ने दख़ल देकर स्पष्ट किया कि पत्ते पर किसी कीड़े के चलने से सर्पाकार आकृति बन रही है। यह कोई अलौकिक घटना या चमत्कार नहीं है। पूरे बरसाती मौसम में अधिकांश लोगों ने तोरई की सब्ज़ी का स्वाद नहीं चखा।  तोरई बाज़ार में उपलब्ध होती थी लेकिन ख़रीदार न होने से कीमत बहुत सस्ती थी। 

         21 सितम्बर 1995 में गणेश जी की मूर्ति के दूध पीने की अफ़वाह संगठित तौर पर फैलाई गयी।  भौतिकशास्त्रियों ने हस्तक्षेप करते हुए स्पष्ट किया कि यह मात्र अफ़वाह है पृष्ठ तनाव ( सरफ़ेस टेंशन )के कारण कोई धातु की मूर्ति दूध का मामूली अंश अवशोषित कर सकती है।  वहीं आपराधिक मामलों में उसी समय गिरफ़्तार हुए  विवादास्पद तांत्रिक चंद्रास्वामी ने अगले दिन  दावा किया कि उन्होंने ही भगवान गणेश जी से ऐसा चमत्कार दिखाने की प्रार्थना की थी।  

        अब इक्कीसवीं शताब्दी का भारत एक बार फिर 2001 में देश की राजधानी  दिल्ली में "मंकी मैन" की अफ़वाह से दहशत में हफ़्तों जिया। मीडिया में इस अफ़वाह  को जमकर स्थान मिला। मंकी मैन द्वारा जो भी किया जाता रात को किया जाता था।  अंत में यह कोरी अफ़वाह ही मानी  गयी। 

        2006 में मुंबई में समुद्र के पानी के मीठे होने की अफ़वाह फैली थी। लोग समुद्र किनारे एकत्र होकर अपना कुतूहल शांत करने के लिए समुद्र का पानी चखने एकत्र हुए। 

          मेरे पते पर अक्सर ऐसे पोस्ट-कार्ड आते रहते थे (पत्र -पत्रिकाओं में नाम के साथ पता भी छापा जाता था) जिनमें चेतावनी होती थी कि इस पोस्ट-कार्ड में लिखी बातों को ( जोकि धार्मिक बिषय होते थे ) 20 अन्य पोस्ट-कार्डों पर लिखकर पोस्ट करो नहीं तो आपका अनिष्ट हो जायेगा। कभी रास्ते  में  कोई पर्चा थमा देता था कि  ऐसे ही 1000 पर्चे छपवाकर बाँटो नहीं तो वैसा ही आपके साथ होगा जैसा इस पर्चे में उल्लेख है उन लोगों का जिन्होंने पर्चे न छपवाकर होशियारी दिखाई।  मैंने हमेशा ऐसे पोस्ट-कार्डों  और भ्रामक उल्लेख वाले पर्चों को आग के हवाले कर दिया और अपने आपको 1020 लोगों की बद-दुआएं लेने से बचा लिया।   

         अफ़वाहें करोड़ों लोगों को अपने अनुसार यदि संचालित करने लगें तो इनमें छिपे  निहित स्वार्थों को पूरा होते देख शरारती तत्व व्यापक योजना पर कार्य करने को प्रोत्साहित होते हैं। देश की धर्मभीरु जनता धूर्तों के झाँसे में आकर अपना बड़ा से बड़ा नुकसान कर बैठती है।  हक़ीक़त ज्ञात होने पर पछतावा करती है। इसीलिए कहा गया है - अब पछताए होत का जब चिड़ियाँ  चुग गयीं  खेत.....

          मास हिस्टीरिया ( सामूहिक सनकीपन ऐसी स्थिति है जब किसी स्थान विशेष के लोग कही-सुनी बातों पर विश्वास करके खुद भी वैसा ही करने लगते हैं ) ,शेयर्ड सायकोसिस ( ऐसी मानसिक अवस्था जिसमें एक मानसिक  तौर पर अस्वस्थ व्यक्ति को देखकर दूसरा भी वैसी ही हरकतें करने लगता है ) , बहुव्यक्तित्व विकार (मल्टीपल पर्सनाल्टी डिसऑर्डर/ डिसोसिएटिव डिसऑर्डर ), ओसीडी , सिज़ोफ्रीनिया ,बाइपोलर डिसऑर्डर ,उन्माद , अवसाद जैसे मानसिक रोगों के बारे में जनता को जाग्रत करना ज़रूरी है। मनोवैज्ञानिक अंतर्द्वंद्व से घिरे लोग जो सुनते हैं और देखते हैं उसे अपने साथ घटित होने जैसा मानने लगते हैं।

          वर्तमान में आर्थिक समस्याओं का भारी  बोझ और समय की कठिन चुनौतियां  मानसिक रोगियों की संख्या में तेज़ी से इज़ाफ़ा कर रही हैं। मनोरोगियों के लिए देश में साधन और सुबिधाओं की भारी कमी है। मनोचिकित्सक बड़े शहरों में ही उपलब्ध हैं।  ग्रामीण जनता ओझाओं और तांत्रिकों के फेर में उलझी रहती है
और कई ज़िंदगियाँ समुचित इलाज के अभाव में त्रासद जीवन जीती हुई ज़िदगी का बोझ ढोती रहती हैं। मानसिक रोगियों को यथोचित मानसिक रोग विशेषज्ञ के परामर्श हेतु सहज उपलब्धता होनी चाहिए। मानसिक रोग चिकित्सक से परामर्श ले रहे व्यक्तियों का समाज मज़ाक़ उड़ाता है जोकि सभ्य समाज के लिए एक बड़ी चुनौती है।
  
           विज्ञान के अनुसार भूत, चुड़ैल जैसे काल्पनिक पात्रों का वास्तविक जीवन में कोई अस्तित्व नहीं है अर्थात ये केवल डर पैदा करने वाले उपाय और अंधविश्वास हैं जिनसे उबरने के लिए लोग अपना ज्ञान दुरुस्त करें और मानसिक रूप से मज़बूत बनें। कई  लोगों के बीच  यदि कोई मानसिक रोगी कहता है कि- "वो देखो मुझे कोई दिख रहा है "  और  बाक़ी  लोगों को कुछ नहीं दिख रहा होता है  तो वह सही कह रहा होता है क्योंकि मानसिक रोगों की यह भी एक अवस्था है जिसमें  मस्तिष्क में नकारात्मक रासायनिक बदलावों के कारण रोगी दृष्टि -भ्रम का शिकार हो जाता है।    समाज में व्याप्त अंधविश्वासों को सयाने अब कमाई का ज़रिया बना चुके हैं जिसकी हक़ीक़त हमें समझनी होगी। अंधविश्वासों से ख़ुद को बाहर निकालना होगा। शिक्षा का स्तर सुधारना होगा। विचार कीजिये दुनिया हमारे बारे में इस वक़्त क्या सोच रही होगी .....? 

#रवीन्द्र सिंह यादव