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शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

#Farmers क्या क़र्ज़ माफ़ी किसानों की समस्या का हल है ?

भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता रहा है। देश की अधिकांश जनसँख्या अपने जीवन यापन के लिए कृषि पर निर्भर है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत की 49 प्रतिशत जनता कृषि क्षेत्र पर निर्भर है।
सन 1950 में देश की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद ) में कृषि क्षेत्र का योगदान 50 प्रतिशत था जो अब घटकर लगभग 15 प्रतिशत रह गया है। कारण स्पष्ट है कि सरकार ने कृषि क्षेत्र की घोर उपेक्षा कर अन्य क्षेत्रों को भरपूर बढ़ावा दिया। आगे आने वाले 5 वर्षों में कृषि क्षेत्र का जीडीपी में योगदान घटकर 10 प्रतिशत से भी नीचे  चला जाय यह स्वाभाविक है क्योंकि भारत सरकार जिस प्रकार से उद्योगों को बढ़ावा दे रही है उससे कृषि योग्य भूमि के लगातार कम होते जाने की प्रबल संभावनाएं हैं। उद्योगों को उदारतापूर्वक ज़मीन उपलब्ध कराई जा रही है।

थम नहीं रहा है किसानों की आत्महत्याओं का दौर -

आज किसान क़र्ज़ (बैंकों ,महाजनों /साहूकारों )के बोझ से दबा हुआ है ,खेती में नुकसान ,सूखा ,ग़रीबी ,बीमारी ,पारिवारिक समस्या ,बढ़ती महंगाई ,बढ़ते खर्चे ,फ़सल की बर्बादी से व्यथित होकर आत्महत्या जैसे त्याज्य क़दम उठा रहे हैं। यह सिलसिला अब रुकना चाहिए। माननीय सर्वोच्च न्यायलय भी किसानों की आत्महत्याओं पर सुनवाई कर रहा है जहाँ सरकार की ओर  से पेश किये जा रहे किसानों की आत्महत्याओं के आँकड़े गंभीर चिंता का बिषय हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े बताते हैं कि किसानों की आत्महत्याओं की दर बढ़ती जा रही है।

मार्च से ही किसान आंदोलन की भूमिका -

वर्तमान में किसानों के आन्दोलन से उपजे हालातों की चर्चा ज़ोरों पर है। देशभर के किसान संगठन अब एक होकर सरकार पर दबाव बना रहे है ताकि किसानों की समस्याओं का स्थायी निदान हो सके। पिछले 14 मार्च से तमिलनाडु के किसानों ने 43 दिन तक दिल्ली के जंतर मंतर पर बैंक क़र्ज़ की माफ़ी से  लेकर किसानों की समस्याओं के समाधान हेतु  विभिन्न तरीकों से आंदोलन किया अंत में उन्होंने अपने तय कार्यक्रम के अनुसार पेशाब पिया तो केंद्र सरकार की निष्ठुरता पर गंभीर सवाल उठे। तब तमिलनाडु की राजनीति सक्रिय हुई और आश्वासन के बाद  23 अप्रैल को किसानों ने आंदोलन स्थगित किया।  इस आंदोलन की रचनात्मकता ने देशवासियों का ध्यान किसानों की समस्याओं की ओर खींचा।

अब ये किसान पुनः जंतर मंतर दिल्ली में अपना आंदोलन 18 जुलाई की किसान रैली से पहले ही  बहाल कर चुके हैं अपनी पुरानी  मांगों को लेकर।

प्रधानमंत्री द्वारा क़र्ज़ माफ़ी की घोषणा -

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा घोषणा की गयी कि यदि उनकी पार्टी चुनाव जीतेगी तो उत्तर प्रदेश के किसानों के क़र्ज़ माफ़ किये जाएंगे।  पार्टी को सत्ता मिली और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा अनेक किन्तु -परन्तु के साथ राष्ट्रीयकृत बैंकों से लिए गए जून 2016 तक के 1 लाख तक के फ़सली ऋण की माफ़ी की घोषणा कर दी गयी लेकिन इस घोषणा को अभी तक अमली जामा पहनाये जाने के पुख़्ता  इंतज़ाम नहीं हो पाए हैं। यहाँ विवादस्पद मुद्दा बना कि प्रधानमंत्री सिर्फ़ चुनावी राज्य  में किसानों के बैंक ऋण की माफ़ी की घोषणा कैसे कर सकते हैं।

किसानों का दिशाहीन उग्र आंदोलन -

महाराष्ट्र में 1 जून से किसानों ने अपना आंदोलन किसान आयोग के अध्यक्ष रहे डॉक्टर एम  एस  स्वामीनाथन द्वारा सुझाई गयी सिफारिशों को लागू करने और क़र्ज़ माफ़ी की मांग पर शुरू किया।  इस आंदोलन में किसानों ने अपने उत्पाद दूध ,फल,सब्ज़ियां आदि सडकों पर बिखेर दिए और आंदोलन को उग्र बना दिया वहीँ 2 जून से मध्य प्रदेश के मालवा में भी किसानों के उग्र आंदोलन ने सरकारी एवं निजी संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचाया।  यहाँ मंदसौर में 6 किसानों की पुलिस की गोली से मौत हो गयी।  मध्य प्रदेश सरकार ने मरने वालों के परिवार को 1 करोड़ रुपये मुआवज़ा और सम्बन्धी को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की।

केंद्र सरकार की कठोरता -

इस बीच केंद्र सरकार ने साफ़ कर दिया कि किसानों की क़र्ज़ माफ़ी का मुद्दा राज्य सरकारों का है उसकी ओर से कोई  राहत नहीं दी जाएगी।  बल्कि केंद्र सरकार के एक मंत्री ने तो किसान क़र्ज़ माफ़ी को फ़ैशन तक बता दिया।  ऐसी संवेदनहीनता किसानों के प्रति देश की जनता ने पहली बार देखी - सुनी। जबकि केंद्र सरकार किसानों की आय 5 साल में दो गुनी करने की घोषणा कई बार कर चुकी है लेकिन वास्तविकता यह है कि सरकार ने किसानों को फ़सल  की औसत लागत का डेढ़ गुना दाम देने का अपना चुनावी वादा तक नहीं निभाया जोकि स्वामीनाथन आयोग की एक सिफारिश है। किसानों के हालिया उग्र आंदोलन की एक बजह पिछले साल नबंवर में हुई नोट बदली की घोषणा भी है।

अन्य राज्यों ने भी की क़र्ज़ माफ़ी की घोषणा -

इस आंदोलन के दौरान महाराष्ट्र ,पंजाब ,और कर्नाटक सरकारों ने किसानों के बैंक क़र्ज़ को माफ़ करने की घोषणा विभिन्न शर्तों के साथ कर दी।  अब गुजरात और हरियाणा के किसान भी क़र्ज़ माफ़ी की मांग को तेज़ करने की तैयारी में हैं।

मंदसौर से दिल्ली तक -

इस आंदोलन का महत्वपूर्ण पड़ाव है देशभर के किसान संगठनों का एक मंच पर जाना। देशभर के विभिन्न 200 से अधिक किसान  संगठन अपनी मांगों को लेकर  अब एक साझा आंदोलन की तैयारी कर चुके  हैं।
   6  जुलाई 2017  से  18  जुलाई 2017  तक  मंदसौर से दिल्ली तक ( म. प्र. , महाराष्ट्र , गुजरात ,राजस्थान ,उत्तर प्रदेश ) की यात्रा से एक बार फिर किसान आंदोलन देश में चर्चा का बिषय बन गया ।

कुछ उपाय -

सरकार को स्पष्ट किसान -नीति बनाकर किसानों की समस्याओं का समाधान करना चाहिए न कि किसानों के साथ तरह -तरह के भेदभाव अपनाने चाहिए। न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार द्वारा घोषित किया जाता है फिर भी सरकार किसान की पूरी उपज उस मूल्य पर खरीदने से कतराती है। किसान को उसकी फ़सल का डेढ़ गुना दाम मिले और सरकार किसान द्वारा बेची  जाने वाली उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने से न हिचकिचाए।  किसानों को उन्नत खेती के प्रति आकर्षित करे उन्हें भरोसा दे तब किसानों की आत्महत्याओं का दौर थम सकेगा। किसानों की कमाई हड़पने वाले दलालों को रोका जाय। फसल -बीमा को  अधिक ग्राही ,उपयोगी और सरल बनाया जाय। छोटे किसानों का संरक्षण किया जाय।  किसान -पेंशन भी आरम्भ की जाय। यथोचित स्वास्थ्य सुबिधायें गाँव तक विकसित की जाएँ।


किसान के साथ बड़ी बिडम्बना यह है कि उसका उत्पाद देश की जनता को सस्ते दामों पर मिलता रहे इसलिए उसे अपने उत्पाद की कीमत तय करने का अधिकार नहीं है जबकि उद्योगपति अपने उत्पादों की कीमतें ख़ुद तय करते हैं। किसानों के प्रति सरकार द्वारा सहानुभूतिपूर्वक रचनात्मक क़दम उठाये जाने चाहिए ताकि किसान बार -बार क़र्ज़ के जाल में न फंसे।
#रवीन्द्र सिंह यादव