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शनिवार, 7 जनवरी 2017

कितने बदनुमा दाग़ और बाक़ी हैं समाज के चेहरे पर ?



नववर्ष  की  पूर्व  संध्या (३१ दिसंबर २०१६ ) पर  कर्णाटक  की राजधानी  बैंगलुरु  में  युवतियों  से  हुई  सामूहिक  बदसलूकी  आज  के  समाज  के  खोखलेपन   का  ज्वलंत   उदाहरण  है।  एक शहर   जो  आधुनिकतम  सुबिधाओं   से  सुसज्जित   है   जहां   सुरक्षा  के  इंतज़ाम   पुख़्ता   हैं  फिर   भी  आज  देश का  आपराधिक  मनोवृति  का  युवा  कानून   को  सरेआम  तोड़ने  का  दुस्साहस  दिखा  रहा   है।  जिसने  भी  इस घटना   के  वीडियो   देखे  वह  आक्रोश  और  गहरे क्षोभ  से भर  गया। "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:"  जैसा   महान  दर्शन  सृजित   करने  वाला  देश  आज  कहाँ  पहुँच   गया है?

           देश   के  सितारों ( फिल्मकार  और  खिलाड़ी ),बुद्धिजीवियों , महिला संगठनों   ने  एक  ओर   इस घटना  के विरोध  में  आवाज़  उठायी  वहीं  नेताओं  ने  गैर-ज़रूरी  बयान दिए।   कर्णाटक राज्य सरकार  के गृह मंत्री का  कथन  पीड़ा  पर मरहम  लगाने  के बजाय  घाव  पर नमक  डालने  जैसा  था  वहीं   समाजवादी  पार्टी  के मुम्बई  के  नेता  ने  यहाँ  तक  कह  दिया  कि  आग  वहीँ लगती  है जहां पेट्रोल  होता  है।  नेताओं ने  महिलाओं के  परिधान  पर  तो  सवाल  उठाये   लेकिन  उन वहशीपन दिखाने  वाले  असामाजिक  तत्वों  के बारे  में  कुछ नहीं कहा।  सोशल -मीडिया  ने   अपना  दायित्व  निभाते   हुए   इस मुद्दे   को  मरने   नहीं दिया  तब  एक  हफ़्ते  बाद  राज्य  की पुलिस  ने  चार  आरोपियों  को  गिरफ़्तार  किया।

           १६ दिसंबर  २०१२  की  रात   दिल्ली   में  हुए  निर्भया-काण्ड  के बाद  महिला-सुरक्षा  को लेकर  आंदोलन   हुआ  परिणामस्वरूप  संशोधित  सशक्त  महिला -सुरक्षा   कानून  ३  अप्रैल  २०१३  से लागू किया गया।    लेकिन  आज  भी  देशभर  से  महिला-उत्पीड़न  के जो समाचार  आ रहे  हैं  उनका  सन्देश  सिर्फ इतना  है  कि  हमारा  समाज  और  व्यवस्था  महिलाओं  की सुरक्षा  को  लेकर  संवेदनशील  नहीं  हैं.

             इंटरनेट  के  साथ   पल  रही  नई  पीढ़ी  भारतीय  जीवन दर्शन  के महान  मूल्यों  से  अपने आप  को  दूर   खड़ा  कर  रही   है।  हिंसा , बल प्रयोग  और  अभद्रता  हमारे  आसपास  ही  मड़राती  रहती  है  जिसे  नवोदित  पीढ़ी  नासमझी  में  प्रायोगात्मक  रूप   देने  की  कोशिश  करती  है   जोकि  बाद  में  ख़तरनाक   शक़्ल  अख़्तियार  करती  है।  महिलाओं  पर  अत्याचार  की  सोच  दबी हुई कुंठा  से  उपजी है  जो  हमारे  सामने  वीभत्स  रूप   में  प्रकट   होती   है।

            भीड़तंत्र   में बढ़ता   हमारा   विश्वास   आत्मघाती   है।    एक  नेता   को  हमने पिछले  दिनों  उसकी  सभा  में  आयी   भीड़  से   आल्हादित   होते   देखा।   किराए  की  भीड़  स्वार्थवश  नियंत्रित  हो  सकती  है।  किसी  विचारधारा  के  साथ  जुडी  भीड़  अपने  आप को श्रेष्ठतर  दिखाने  के फेर  में  अनुशासित  हो  सकती  है
लेकिन   निरुद्देश्य  लापरवाह  उन्मादी   भीड़  का कोई  धर्म -ईमान   नहीं  होता  उसमें शामिल  लोग  चेहरा  छुपाकर   कुंठित   मानसिकता   का  भरपूर  प्रदर्शन  करते  हैं।

             कला   के  नाम  पर  कामुकता   को  बेचने  वाला  सिनेमा आज  विशुद्ध  व्यावसायिक  लिबास  में  हमारे  सामने  खड़ा    है।  बच्चे   अब  संस्कार  परिवार  के  बुज़ुर्गों  से  आत्मसात  करने  के बजाय   सिनेमा , टेलीविज़न  धारावाहिकों  और  अंतर्जाल  ( इंटरनेट)  को तरज़ीह  दे  रहे  हैं।  परिवारों  से  लेकर   जीवन  के हरेक क्षेत्र   में अनुशासनहीनता  ने अपने पाँव   पसार   लिए   हैं।   ऐसे   में   हमारा   लोकतंत्र   में  जीने   का  सपना  कहीं   हमसे   छिन   न  जाय  यह   भय  भी  मानस  को  मथने  लगा   है  क्योंकि  दोषारोपण  मात्र  से  व्यवस्था  अपना  अभीष्ट  हासिल   नहीं  कर  सकती।  परिवार  अपने  बेटों  को  महिलाओं  का सम्मान  करने  के  लिए   मौलिक  भावभूमि  का  निर्माण   करें।

                                                                                            - रवीन्द्र  सिंह यादव